शास्त्रोक्त विधि-विधान से गया जी में पिंडदान, तर्पण एवं श्राद्ध कर्म संपन्न कराएं।
सनातन हिंदू धर्म में गया तीर्थ को पितरों के मोक्ष का सबसे प्रमुख द्वार माना गया है। वायु पुराण और गरुड़ पुराण के अनुसार, यह वह परम पावन भूमि है जहाँ साक्षात् भगवान विष्णु के चरण चिह्न (विष्णुपद) विराजमान हैं।
"गया श्राद्ध से पितृदोष निवारण होता है। हिंदू परंपरा में विष्णुपद मंदिर और गया क्षेत्र को पितृकर्म के प्रमुख तीर्थों में माना जाता है। यहाँ पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध करके पितरों की शांति एवं सद्गति की प्रार्थना की जाती है।"
मान्यता है कि गया जी में फल्गु नदी के तट पर और यहाँ की विभिन्न वेदियों पर पिंडदान करने से सात गोत्रों और 101 कुल के पितरों का उद्धार हो जाता है। भगवान राम ने भी माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध इसी पवित्र भूमि पर किया था।
हमारे तीर्थपुरोहित द्वारा निम्नलिखित अनुष्ठान वैदिक रीति से संपन्न कराए जाते हैं
यह सामान्य पिंडदान से अलग एक विशेष श्राद्ध/प्रायश्चित्त कर्म माना जाता है, जिसका उल्लेख गरुड़ पुराण की परंपरा में मिलता है। इसका मुख्य उद्देश्य अकाल/असामान्य मृत्यु से जुड़े मृत व्यक्ति के लिए शांति और सद्गति की प्रार्थना करना है।
नारायण = भगवान विष्णु
बली = अर्पण/समर्पण
अर्थात भगवान नारायण को साक्षी मानकर मृत आत्मा की शांति और सद्गति के लिए किया जाने वाला विशेष कर्म। शास्त्रीय परंपरा में इसे विशेष रूप से उन परिस्थितियों से जोड़ा जाता है जहाँ मृत्यु असामान्य/अकाल हुई हो।
त्रिपिंडी श्राद्ध एक विशेष पितृ-कर्म/श्राद्ध विधि है, जिसमें पितरों की शांति और सद्गति के लिए तीन पिंड अर्पित किए जाते हैं। “त्रिपिंडी” का संबंध सामान्यतः तीन पीढ़ियों के पितृ-प्रतिनिधित्व से जोड़ा जाता है। इसे विशेष रूप से पितृदोष निवारण हेतु कराया जाता है।
तीन पिंड किसके लिए?
गया जी में पिंडदान की अपनी विस्तृत परंपरा है और अलग-अलग वेदियों पर पितृकर्म किया जाता है। स्थानीय गया-श्राद्ध परंपरा के अनुसार 1 दिन, 3 दिन, 7 दिन या 17 दिन का विधान है।
तिल, कुशा, जल, जौ और चावल के आटे का पिंड बनाकर मंत्रोच्चार के साथ पितरों को अर्पित किया जाता है। इससे पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-शांति व वंश वृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
श्राद्ध कर्म से जुड़े गया क्षेत्र के पवित्र स्थान जहाँ पिंडदान का विशेष महत्व है।
यहाँ भगवान विष्णु के चरण चिह्न हैं। यहीं पर मुख्य पिंडदान किया जाता है।
माता सीता के श्राप से यह अंतःसलिला है। बालू खोदकर जल निकाला जाता है और तर्पण होता है।
अंतिम पिंडदान और ब्राह्मण भोजन यहाँ होता है। माता सीता ने इसे अमरता का वरदान दिया था।
अकाल मृत्यु को प्राप्त पितरों की शांति के लिए इन पहाड़ियों पर विशेष सत्तू का पिंड दिया जाता है.
गया जी में कुल 360 वेदियों का वर्णन शास्त्रों में है, जिनमें से वर्तमान में मुख्य रूप से 54 वेदियों पर पिंडदान होता है।
पितृ पक्ष (महालय) में अपार भीड़ होती है, अतः असुविधा से बचने के लिए पूर्व बुकिंग अवश्य कराएं। रहने और पूजा सामग्री की संपूर्ण व्यवस्था हमारे द्वारा की जाएगी।